चंद्रयान 3 मिशन के उद्देश्य और सफल लॉन्चिंग के बारे में…
दोस्तों! हम सभी बचपन से लेकर अभी तक चंद्रमा के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। कोई कहता है चंद्रमा पर पानी है ऑक्सीजन भी है, चंद्रमा पर पृथ्वी की तरह मनुष्य के रहने लायक वातावरण है। इन सभी प्रश्नों की सारी जानकारी जल्दी ही चंद्रयान 3 के द्वारा पता चल जाएगी।

अमेरिका, रूस और चीन ने चांद की सतह पर सॉप्ट लैंडिंग कराने में सफलता हासिल की है लेकिन अभी तक चांद के दक्षिणी ध्रुव इलाके में किसी देश के स्पेसक्राफ्ट ने लैंडिंग नहीं की है। भारत अगर इसमें सफल हो जाता है तो वह यह उपलब्धि हासिल करने वाला पहला देश बन जाएगा। अमेरिका के सर्वेयर -1 ने 1966 में चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की थी। चीन के चांग-3 ने अपने पहले ही प्रयास में चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की थी। वहीं सोवियत संघ के लूना-9 ने भी सफलतापूर्वक चांद पर लैंडिंग की थी।
आइए chandrayaan-3 से पहले chandrayaan-2 के बारे में छोटी सी जानकारी आपको बताते चले।
चंद्रयान-2 मिशन-

*चंद्रयान-2 में एक ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर शामिल थे, जो सभी चंद्रमाओं का अध्ययन करने के लिये वैज्ञानिक उपकरणों से लैस थे।
*ऑर्बिटर द्वारा 100 किलोमीटर की कक्षा में चंद्रमा को देखा गया, जबकि चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने के लिये लैंडर और रोवर मॉड्यूल को अलग किया गया था।
*इसरो ने लैंडर मॉड्यूल का नाम विक्रम, भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अग्रणी विक्रम साराभाई के नाम पर रखा था और रोवर मॉड्यूल को प्रज्ञान नाम दिया गया जिसका अर्थ है- ज्ञान ।
*इसे देश के सबसे शक्तिशाली जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल, जीएसएलवी एमके 3 ( GSLV-MK 3) द्वारा भेजा गया था।
*हालाँकि लैंडर विक्रम द्वारा नियंत्रित लैंडिंग के बजाय क्रैश- लैंडिंग की गई जिस कारण रोवर प्रज्ञान को चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक स्थापित नहीं किया जा सका।
(चंद्रयान-3)
चंद्रयान 2 की तरह समस्या उत्पन्न होने पर चंद्रयान 3 में क्या होगा?
चंद्रयान 2 में उत्पन्न हुई तकनीकी त्रुटियों का पूरी तरह से विश्लेषण करने के बाद लैंडर मॉड्यूल में ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि दोबारा ऐसी समस्या आए तो उसका हल निकल आए।
इसरो के अध्यक्ष सोमनाथ ने कहा कि जब चंद्रयान-3 उतरेगा, उस वक्त क्षैतिज स्थिति से 90 डिग्री ऊर्ध्वाधर स्थिति प्राप्त करना महत्वपूर्ण होगा और सॉफ्ट लैंडिंग तक उसी स्थिति को बनाए रखना होगा।
सोमनाथ ने कहा कि चंद्रयान-3 लैंडर के इंजन फेल होने या कुछ सेंसर काम नहीं करने की स्थिति में भी सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग के लिए सभी आवश्यक इंतज़ाम किए गए हैं।
लैंडर मॉड्यूल नियंत्रण क्यों नहीं कर पाते ?
चंद्रयान-3 का लैंडर एक लंबी गोलाकार कक्षा में चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा है। चंद्रमा की सतह से सौ किलोमीटर ऊपर से गुजरने के बाद, इसे चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में लाने के लिए अपने बूस्टर को प्रज्वलित करता है. इसके बाद यह चंद्रमा की सतह की ओर तेज़ी से गिरने लगता है।
जब यह गिरने लगता है, तब इसका वेग बहुत अधिक होता है। पृथ्वी से चंद्रमा तक एक रेडियो सिग्नल भेजने में लगभग 1.3 सेकंड का समय लगता है। उसी सिग्नल को दोबारा ज़मीन तक पहुँचने में 1.3 सेकंड का समय लगता है।
इस प्रकार, चंद्रयान लैंडर पृथ्वी पर एक सिग्नल भेजता है और प्रतिक्रिया में दूसरे सिग्नल को उस तक पहुँचने में 1.3 सेकंड का समय लगता है। इसका मतलब है कि इसे पूरा होने में लगभग ढाई सेकंड का समय लगता है।
मतलब कई सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चंद्रमा पर गिरने वाले लैंडर को नियंत्रित करने में ढाई सेकंड का समय लगता है। इस अतिरिक्त समय के कारण ही लैंडर को ऐसा बनाया जाता है कि लैंडर अपने निर्णय ख़ुद लेता है।
ऐसे प्रयासों में तकनीकी रूप से सब कुछ ठीक होना चाहिए नहीं तो एक छोटा सा अंतर भी मुश्किलों का कारण बन सकता है।
चंद्रयान-3 पहले अपने बूस्टर को फायर करके सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करता है ताकि वह चंद्रमा की सतह की ओर गिर सके। वहां से यह तेज़ी से चंद्रमा की सतह पर गिरेगा।
इस प्रकार, उतरते समय लैंडर मॉड्यूल चंद्रमा की सतह से 90 डिग्री के कोण पर होना चाहिए। चंद्रयान-3 के चारों पैर चंद्रमा की सतह को लंबवत रूप से नहीं छू सकते, चाहे वे कितने भी किनारे की ओर झुक जाएं।
तब चंद्रयान के औंधे मुंह गिरने का ख़तरा होगा। अगर ऐसा हुआ तो रोवर इससे बाहर भी नहीं निकल पाएगा।
चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के बाद लैंडर मॉड्यूल पृथ्वी पर सिग्नल भेजता है। थोड़ी देर बाद इसमें लगा रैंप खुल जाएगा। इसके ज़रिए रोवर प्रज्ञान चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और वहाँ से तस्वीरें लेकर बेंगलुरु के पास इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क को भेजेगा।
वैज्ञानिक प्रेस संगठन के मास्टर वैज्ञानिक डॉ. टी.वी. वेंकटेश्वरन ने बीबीसी को बताया कि एक सौ किलोमीटर की ऊंचाई से चंद्रमा की सतह पर लैंडर को उतारने की 15 मिनट की प्रक्रिया आठ चरणों में पूरी की जाएगी।
सॉफ्ट लैंडिंग की प्रक्रिया तब शुरू होगी जब वह 100 किमी से 30 किमी की ऊंचाई से नीचे नहीं उतर जाता। तब तक लैंडर के पैर चंद्रमा की सतह के क्षैतिज स्थिति में होते हैं। फिर गति को और कम करने के लिए लैंडर में रॉकेट दागे जाएंगे।
जब लैंडर 30 किमी की ऊंचाई पर होता है तो उसकी गति बहुत अधिक होती है। उस गति को नियंत्रित करते हुए यह चंद्रमा की सतह से 7.4 किमी की ऊंचाई तक पहुंचता है। सौ किलोमीटर की ऊंचाई से यहां पहुंचने में दस मिनट लगते हैं। इसे पहला क़दम कहा जा सकता है।
चंद्रयान-3 मिशन के उद्देश्य हैं-

1. चंद्र सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग प्रदर्शित करना।
2. रोवर को चंद्रमा पर भ्रमण का प्रदर्शन करना
3. यथास्थित वैज्ञानिक प्रयोग करना।
23 अगस्त को शाम छह बजे लैंड करेगा चंद्रयान-3-

चंद्रयान-3 मिशन का लैंडर मॉड्यूल चांद की सतह पर 23 अगस्त 2023 को शाम 6.04 बजे सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। इसरो ने यह जानकारी दी है। बता दें कि पहले बताया गया था कि लैंडर चांद पर शाम 5.45 बजे लैंड करेगा लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है।
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