लाल बहादुर शास्त्री

लाल बहादुर शास्त्री 

देश की एकता एवं अखंडता को बनाए रखने में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शास्त्री ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर आजादी में अहम भूमिका निभाई।

लाल बहादुर शास्त्री का आरंभिक जीवन-

लाल बहादुर जी को बचपन में परिवार के सदस्य ‘नन्हे’ कहकर बुलाते थे। बचपन में ही शास्त्री की के पिता का स्वर्गवास हो गया। इसमें बाद लाल बहादुर जी की माता इन्हें लेकर अपने पिता हजारी लाल के घर मिर्जापुर आ गई। कुछ समय पश्चात इनके नाना का भी देहांत हो गया।

इनकी प्राथमिक शिक्षा  मिर्ज़ापुर में ही हुई एवं आगे का अध्ययन हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी-विद्यापीठ में हुआ। लाल बहादुर जी ने संस्कृत भाषा में स्नातक किया था। काशी-विद्यापीठ में इन्होने ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की। इस वक्त के बाद से ही इन्होने ‘शास्त्री’ को अपने नाम के साथ जोड़ दिया। इसके बाद इन्हें शास्त्री के नाम से जाना जाने लगा।

1928 में इनका विवाह ललिता शास्त्री के साथ हुआ। इनके छह संताने हुई। इनके एक पुत्र अनिल शास्त्री काँग्रेस पार्टी के सदस्य रहे।

लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री

शास्त्री जी का राजनीतिक जीवन-

गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के दौरान लाल बहादुर थोड़े समय के लिए 1921 में जेल गए थे। गांधीजी के अनुयायी के रूप में वे फिर राजनीति में लौटे व कई बार जेल गए। बाद में उप्र कांग्रेस पार्टी में प्रभावशाली पद ग्रहण किए।

प्रांत की विधायिका में 1937 और 1946 में शास्त्रीजी निर्वाचित हुए। 1929 में इनकी नेहरूजी से मुलाकात के बाद इनकी नजदीकी नेहरूजी से भी बढ़ी। नेहरू मंत्रिमंडल में वे गृहमंत्री के तौर पर सम्मिलित हुए। इस पद पर वे 1951 तक बने रहे। 1951 में नेहरूजी के नेतृत्व में वे कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त हुए। 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस को जिताने के लिए इन्होंने बहुत परिश्रम किया।

नेहरूजी के निधन के बाद शास्त्रीजी प्रधानमंत्री बने। 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक वे प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे। ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा शास्त्रीजी ने ही दिया था। वे छोटे कद के महान राजनेता थे। 1965 के भारत-पाक युद्ध में शास्त्रीजी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया था। स्वतन्त्रता की लड़ाई में शास्त्री जी ने ‘मरो नहीं मारो’ का नारा दिया, जिसने पुरे देश में स्वतन्त्रता की ज्वाला को तीव्र कर दिया.

1920 में शास्त्रीजी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और ‘भारत सेवक संघ’ की सेवा में जुड़ गये. यह एक ‘गाँधी-वादी’ नेता थे, जिन्होंने सम्पूर्ण जीवन देश और गरीबो की सेवा में लगा दिया . शास्त्री जी सभी आंदोलनों एवम कार्यक्रमो में हिस्सा लिया करते थे

एक पुकार पर लाखों भारतीयों ने छोड़ा एक वक़्त का खाना –

“1965 की लड़ाई के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री को धमकी दी थी कि अगर आपने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई बंद नहीं की तो हम आपको पीएल 480 के तहत जो लाल गेहूँ भेजते हैं, उसे बंद कर देंगे।”

उस समय भारत गेहूँ के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। शास्त्री ये बात बहुत चुभी क्योंकि शास्त्री जी स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उन्होंने देशवासियों से कहा कि हम हफ़्ते में एक वक्त भोजन नहीं करेंगे। उसकी वजह से अमेरिका से आने वाले गेहूँ की आपूर्ति हो जाएगी।

लेकिन इस अपील से पहले उन्होंने अपनी पत्नि ललिता शास्त्री से कहा कि क्या आप ऐसा कर सकती हैं कि आज शाम हमारे यहाँ खाना न बने। मैं कल देशवासियों से एक वक्त का खाना न खाने की अपील करने जा रहा हूँ।”

“मैं देखना चाहता हूँ कि मेरे बच्चे भूखे रह सकते हैं या नहीं। जब उन्होंने देख लिया कि हम लोग एक वक्त बिना खाने के रह सकते हैं तो उन्होंने देशवासियों से भी ऐसा करने के लिए कहा- “पूरे देशवासियों ने शास्त्री जी की इस बात को खुशी-खुशी स्वीकार किया”। 

लाल बहादुर शास्त्री जी का रहस्यमय  निधन –

ताशकंद समझोते की रात को ही 11 जनवरी 1966 को उनकी रहस्यपूर्ण तरीके से मृत्यु हो गई. उस वक्त के अनुसार, शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा था, पर कहते है कि इनका पोस्टमार्टम नहीं किया गया था, क्यूंकि उन्हें जहर दिया गया था, जो कि सोची समझी साजिश थी, जो आज भी ताशकंद की आबो-हवा में दबा एक राज़ है. इस तरह 18 महीने ही लाल बहादुर शास्त्री ने भारत की कमान सम्भाली. इनकी मृत्यु के बाद पुनः गुलजारीलाल नंदा को कार्यकालीन प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. इनकी अन्त्येष्टी यमुना नदी के किनारे की गई एवम उस स्थान को ‘विजय-घाट’ का नाम दिया गया .

शास्त्री जी को मिले पुरस्कार और सम्मान-

उन्हें वर्ष 1966 में भारतरत्न से सम्मानित किया गया। लाल बहादुर शास्त्री के सम्मान में भारतीय भारतीय डाक विभाग ने एक डाक टिकट भी जारी किया है।

लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट-

पहले इस हवाई अड्डे का नाम बाबतपुर हवाई अड्डा था। अब यह लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के नाम से जाना जाता है। यह एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में है।

यह एक नागरिक हवाई अड्डा है। यहाँ कस्टम विभाग उपस्थित है।

यहाँ की उड़ान पट्टी पेव्ड है, इसकी लंबाई 7200 फुट है और यहाँ की अवतरण प्रणाली यांत्रिक है।

निष्कर्ष – 

भारत की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से न निपट पाने के कारण शास्त्री जी की आलोचना भी हुई, लेकिन जम्मू-कश्मीर के विवादित प्रांत पर पड़ोसी पाकिस्तान के साथ 1965 में हुए युद्ध में उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ता के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई।

      शास्त्री जी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिए आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है।

दोस्तों आपको लाल बहादुर शास्त्री के बारे में जानकारी कैसी लगी अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य दें।

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